२९८ ऋण्वेद संहिता भाग-९
१५३६. इदमग्ने सुधितं दुर्धितादधि प्रियाद् चिन्मन्मनः प्रेयो अस्तु ते ।
यत्ते शुक्र तन्वोरे रोचते शुचि तेनास्मभ्यं वनसे रत्नमा त्वम् ॥११ ॥
है अग्निदेव ! आपके प्रति हमारे द्वारा निवेदित स्तोत्र दूसरे सभी स्तोत्र कौ अपेक्षा उत्तम हो । इन स्तोत्र से
आपकी तेजस्विता में वृद्धि हो, जिससे रलस्वरूप सुन्दर सम्पदा हम प्राप्त करे ॥११ ॥
१५३७. रथाय नावमुत नो गृहाय नित्यारित्रां पद्वतीं रास्यग्ने ।
अस्माकं वीरँ उत नो मघोनो जनाँश्च या पारयाच्छर्म या च ॥९२॥
हे अग्निदेव ! आप हमारे घर के परिजनो तथा महारथी «रो के लिए यज्ञीय सत्कर्म रूपी सुदृढ़ नाव प्रदान
करें । जो नाव हमारे शूरवीरों, धनसम्पन्नों तथा अन्य मनुष्यों को भी संसार सागर से पार उतार सके । आप हमें
श्रेष्ठ सुख सम्पदा भी प्रदान करें ॥६२ ॥
१५३८. अभी नो अग्न उक्थपिज्जुगुर्या द्यावाक्षामा सिन्धवश्च स्वगूर्ता: ।
गव्यं यव्यं यन्तो दीघहिषं वरमरुण्यो वरन्त ॥१३ ॥
हे अग्निदेव ! हमारे स्तोत्र आपकी भली प्रकार प्रशंसा करे वाले हैं । अन्तरिक्ष, पृथ्वी तथा स्वयं प्रवाहित
सरितायें हमें गौ ओं द्राण उत्पादित दुग्धादि और अत्रादि- पदार्थो को प्रदान करें इसके अतिरिक्त अरुणवर्णा उपाएँ
हमें श्रेष्ठ अन्न ओर वल सामर्थ्य से परिपूर्ण करें ॥१३ ॥
[ सूक्त - १४१ |
[ ऋषि- दीर्घतमा ओचथ्य । देवता- अग्नि । छन्द जगती; १२-१३ ब्रिषटुप् । ]
१५३९. बक्ठित्था तद्वपुषे धायि दर्शतं देवस्य भर्गः सहसो यतो जनि ।
यदीमुप ह्वरते साधते मतिरस्य धेना अनयन्त ससुतः ॥१॥
दिव्य अग्नि की उस रमणीय तेजस्विता को मनुष्य देह कौ सुदृढ़ता हेतु धारण करते है । क्योकि वह
तेजस्विता बल से उत्पादित है । इस विख्यात लोकोपयोगी अग्निदेव कौ तेजस्विता को हमारी विवेक बुद्धि
कव करे । वह हमारे अभीष्ट उद्देश्यों को पूर्णं करे । सभी प्राणियों द्वारा अग्निदेव की ही प्रार्थनाएँ की जाती
॥१ ॥ न
१५४०. पृक्षो वपुः पितुमान्नित्य आ शये द्वितीयमा सप्तशिवासु मातृषु ।
तृतीयमस्य वृषभस्य दोहसे दशप्रमतिं जनयन्त योषणः ॥२ ॥
(अग्निदेव के तीन रूप वर्णित हैं) प्रथम भौतिक अग्नि के रूप में अत्र को पकाने वाले और शरीर को
पोषित करने वाले है । दूसरे सप्त लोको के हितकारक मेघों में विद्युत् रूप में हैं तीसरे बलशाली अग्निदेव सभी
रसों का दोहन करने वाले सूर्य रूप में विद्यमान हैं । ऐसे दशो दिशाओं में श्रेष्ठ इन अग्निदेव को अँगुलियाँ मन्थन
द्वारा उत्पन्न करती हैं ॥२ ॥
१५४१. निर्यदीं बुध्नान्महिषस्य वर्षस ईशानासः शवसा क्रन्त सूरयः।
यदीमनु प्रदिवो मध्व आधवे गुहा सन्तं मातरिश्वा मथायति ॥३ ॥
जब ऋत्विज विशाल अरणियों के मूलस्थान के मन्थन द्वारा उसी प्रकार अग्नि प्रकट करते हैं, जिस प्रकार
पहले भी सोमयज्ञ में आहुति देने के लिए अप्रकर इस अग्नि को विद्धान् मातरिश्वा ने मन्यन द्वारा प्रकर किया था ।
तब सभी के द्वारा उनकी स्तुति की जाती है ॥३ ॥